पाठ्यक्रम: जीएस-2/शासन
सन्दर्भ
- ग्रामीण विकास मंत्रालय का भूमि संसाधन विभाग, डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP) 3.0 (2026–2031) के परिचालन दिशानिर्देशों को आधिकारिक रूप से जारी करने वाला है।
परिचय
- DILRMP 3.0 का मुख्य दृष्टिकोण केवल डिजिटल अभिलेख रखने से आगे बढ़कर एक व्यापक, GIS-सक्षम “लैंड स्टैक(Land Stack)” स्थापित करने पर केंद्रित है।
- प्रमुख हस्तक्षेप:
- सार्वभौमिक भू-आधार (ULPIN): देश के प्रत्येक भू-खंड को 14 अंकों की विशिष्ट पहचान संख्या प्रदान करने की व्यवस्था, जिससे सभी संपत्तियों की सुरक्षित और स्पष्ट पहचान सुनिश्चित हो सके।
- मानचित्रों का डिजिटलीकरण और भू-संदर्भीकरण: भू-खंड संबंधी मानचित्रों का सटीक भौगोलिक निर्देशांकों के साथ पूर्ण डिजिटलीकरण।
- कागजरहित संपत्ति पंजीकरण: शुरू से अंत तक ऑनलाइन, कागजरहित पंजीकरण तथा एक नए पंजीकरण भंडार की शुरुआत। मंत्रालय 37.5 करोड़ रुपये के व्यय से 75 उप-पंजीयक कार्यालयों (SROs) को आधुनिक ‘पंजीकरण सेवा केंद्रों’ में उन्नत करने की भी योजना बना रहा है।
- एकीकृत राजस्व न्यायालय: भूमि अभिलेखों के साथ सीधे एकीकृत आधुनिक, कागजरहित मामला प्रबंधन प्रणाली (RCCMS), ताकि विवादों पर नज़र रखी जा सके तथा कानूनी लड़ाइयों में लगने वाले समय और लागत को कम किया जा सके।
- शहरी क्षेत्रों के लिए नक्शा (NAKSHA) पायलट: नक्शा (NAKSHA) पायलट परियोजना को पूरा करना।
डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP)
- डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (पूर्ववर्ती राष्ट्रीय भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम) को 2016 में पुनर्गठित किया गया और केंद्र द्वारा 100% वित्त पोषण के साथ इसे केंद्रीय क्षेत्र योजना में परिवर्तित किया गया।
- DILRMP का उद्देश्य एक व्यापक और पारदर्शी भूमि अभिलेख प्रबंधन प्रणाली विकसित करना है, जिसका लक्ष्य एक एकीकृत भूमि सूचना प्रबंधन प्रणाली विकसित करना है, जो अन्य बातों के साथ:
- भूमि से संबंधित वास्तविक समय की जानकारी में सुधार करे;
- भूमि संसाधनों के उपयोग को अनुकूलित करे;
- भू-स्वामियों और संभावित निवेशकों दोनों को लाभ पहुँचाए;
- नीति निर्माण एवं योजना में सहायता करे;
- धोखाधड़ी/बेनामी लेन-देन आदि पर रोक लगाए।
भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण की आवश्यकता
- यह विवाद, धोखाधड़ी और अक्षम मैनुअल प्रक्रियाओं जैसी पारंपरिक चुनौतियों का समाधान करके भूमि प्रबंधन में परिवर्तन लाएगा।
- स्वामित्व संबंधी जानकारी ऑनलाइन आसानी से उपलब्ध होगी, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी और अवैध अतिक्रमण कम होंगे।
- यह विवाद समाधान को सरल बनाएगा, न्यायालयों के बोझ को कम करेगा तथा भूमि अधिकारों तक पहुँच में सुधार करके वंचित समुदायों को सशक्त बनाएगा।
- भू-स्थानिक मानचित्रण के साथ एकीकरण से भूमि प्रबंधन में सुधार होगा और सटीक सर्वेक्षण एवं योजना निर्माण संभव हो सकेगा।
- भूमि अधिग्रहण या आपदाओं के दौरान, डिजिटल अभिलेख निष्पक्ष और समयबद्ध मुआवजा सुनिश्चित करेंगे।
भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण से संबंधित चुनौतियाँ
- पुराने और अशुद्ध अभिलेख: ऐतिहासिक अभिलेखों में स्वामित्व, सीमाओं, नामों और सर्वेक्षण संख्याओं से संबंधित त्रुटियाँ हो सकती हैं, जबकि पुराने कागजी मानचित्र वर्तमान जमीनी वास्तविकताओं से सही रूप से मेल नहीं खा सकते।
- विखंडित आँकड़ा-संग्रह: भूमि अभिलेख, पंजीकरण अभिलेख, भू-नक्शे और राजस्व आँकड़ा-संग्रह अलग-अलग प्राधिकरणों द्वारा बनाए जाते हैं और अक्सर अलग-अलग प्रारूपों का पालन करते हैं, जिससे उनका निर्बाध एकीकरण कठिन हो जाता है।
- अंतर-राज्यीय और अंतर-विभागीय समन्वय: भूमि मुख्य रूप से राज्य का विषय है, जबकि आधुनिक भूमि प्रशासन के कई घटकों में केंद्रीय संस्थाएँ शामिल होती हैं। इसलिए केंद्र, राज्य और स्थानीय प्राधिकरणों के बीच प्रभावी समन्वय आवश्यक है।
- साइबर सुरक्षा और आँकड़ा गोपनीयता के जोखिम: डिजिटलीकृत भूमि आँकड़ा-संग्रह में स्वामित्व और संपत्ति से संबंधित संवेदनशील जानकारी होती है, जिससे वे अनधिकृत पहुँच, छेड़छाड़ और साइबर हमलों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं।
आगे की राह
- डिजिटलीकरण के साथ अनुमानित स्वामित्व से निर्णायक और गारंटीकृत भूमि स्वामित्व की दिशा में क्रमिक बदलाव होना चाहिए। इसके लिए विश्वसनीय सर्वेक्षण तथा उपयुक्त स्वामित्व बीमा या राज्य गारंटी का समर्थन आवश्यक है।
- GIS, उपग्रह चित्र, ड्रोन और CORS-सक्षम सर्वेक्षण जैसी आधुनिक तकनीकें भू-सीमाओं की सटीकता में सुधार कर सकती हैं और समय-समय पर अभिलेखों को अद्यतन करने में सहायता कर सकती हैं।
स्रोत: PIB
Next article
रक्षा मंत्री की श्रीलंका यात्रा